हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कुल्लू स्थित कसोल, जीभी और मनाली में पर्यटन के नाम पर करवाई जा रहीं रेव पार्टियों और सरेआम ड्रग्स की उपलब्धता को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। मामले की गंभीरता और पुलिस के दावों में विरोधाभास को देखते हुए वेकेशन न्यायाधीश रोमेश वर्मा की अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के सचिव कुल्लू को निर्देश दिया है कि वह स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मदद से तुरंत उस जगह का दौरा करें। 10 दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपें। अदालत ने डिप्टी कमिश्नर और एसपी कुल्लू को व्यक्तिगत हलफनामा दायर करने को कहा गया है। अदालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति तुरंत संबंधित अधिकारियों को भेजी जाए।

मामले की अगली सुनवाई अब 18 जून को तय बेंच के समक्ष होगी। अदालत ने इस मामले पर खुद संज्ञान लेते हुए सुनवाई की और स्थानीय प्रशासन व पुलिस से सख्त लहजे में जवाब तलब किया है। सुनवाई से पहले कुल्लू और मंडी के पुलिस अधीक्षकों ने अदालत में जो हलफनामा दाखिल किया है, उसमें बताया गया है कि उनके जिलों में रेव पार्टियों को लेकर कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है और पुलिस स्थिति पर पूरी निगरानी रख रही है। हालांकि, हाल ही में एक समाचार पत्र में छपी खबर और तस्वीरों को अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया है। इसके मुताबिक कसोल में 7 जून से 11 जून, 2026 तक 4 दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इसमें लगभग 10 हजार लोग शामिल होने की संभावना बताई गई। इसके मुख्य आयोजक भी इस्राइली नागरिक बताए जा रहे हैं। इस मामले में हाईकोर्ट ने पहले से ही हिमालयन एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन सोसायटी कुल्लू की ओर से अदालत को लिखे गए एक पत्र के संज्ञान लिया है। पत्र में आरोप लगाया गया है कि इन हाई-प्रोफाइल पार्टियों को रसूखदार लोगों और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। इसके बिना ऐसी पार्टियां आयोजित करना मुमकिन नहीं है, जहां एंट्री टिकट 5 हजार से शुरू होकर 7 लाख रुपए तक जाते हैं। इन पार्टियों के वीडियो सोशल मीडिया पर भी मौजूद हैं और वहां ड्रग्स खुलेआम उपलब्ध होने की बात कही गई है।

प्रदेश हाईकोर्ट ने हमीरपुर जिला अदालत परिसर में हुई बेहद गंभीर सुरक्षा चूक पर संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने सरकार और पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि राज्यभर के न्यायिक परिसरों और न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर विस्तृत हलफनामा दायर करें। अदालत ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिला और सत्र न्यायाधीश बेहद संवेदनशील मामलों की सुनवाई करते हैं, जिनमें कई बार मौत की सजा (फांसी) तक सुनाई जाती है। ऐसे में उनकी सुरक्षा से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने राज्य के सभी जिला जजों और संबंधित जिला पुलिस अधीक्षकों से रिपोर्ट मांगी है कि क्या प्रदेश के सभी न्यायिक परिसरों में पर्याप्त सुरक्षा दी जा रही है। क्या संवेदनशील केस संभालने वाले जिला जजों के आवासों पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

राज्य सरकार से भी हलफनामा दाखिल करने को कहा

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से भी हलफनामा दाखिल करने को कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का पालन जमीन पर क्यों नहीं हो रहा है। सरकार को रिपोर्ट देनी होगी कि क्या अदालतों के लिए स्थायी न्यायालय सुरक्षा बल का गठन किया गया है या नहीं, और वर्तमान में किस जिला कोर्ट में कितने सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। अदालत ने पाया कि वर्तमान में हाईकोर्ट के जजों को केवल दो पीएसओ (पर्सनल सुरक्षा अधिकारी) दिए गए हैं, जो रात के समय ड्यूटी पर नहीं होते। कोर्ट ने डीजीपी से हलफनामा दाखिल कर पूछा है कि क्या हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के आवासों पर सशस्त्र गार्ड के जरिये रात के समय सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है या नहीं। अगली सुनवाई 23 जुलाई को होगी।

ये है पूरा मामला

गौरतलब है कि 25 मई को हमीरपुर के जिला एवं सत्र न्यायालय में एक व्यक्ति लोडेड हथियार (भरी हुई बंदूक) के साथ अदालत परिसर में दाखिल हो गया। उसने कोर्ट के भीतर ही अपनी बंदूक को अनलॉक किया और वहां मौजूद वकीलों व जजों को जान से मारने की धमकी दी। हाईकोर्ट ने असंतोष जताया कि हमीरपुर कोर्ट परिसर में कुल 8 अदालतें काम कर रही हैं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर वहां केवल एक महिला पुलिसकर्मी और एक होमगार्ड की तैनाती की गई थी। कोर्ट ने नोट किया कि 29 अप्रैल 2026 को हुई जिला न्यायालय प्रबंधन प्रणाली की बैठक में आश्वासन दिए जाने के बावजूद पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा बढ़ाने के लिए कोई कदम नहीं उठाए।

मेडिकल कॉलेज में ओबीसी आरक्षण रोस्टर लागू न करने पर दायर याचिका ली वापस

प्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को विभिन्न मेडिकल पाठ्यक्रमों में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) श्रेणी के छात्रों को राज्य सरकार की अधिसूचना के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व न देने को लेकर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि मंडी जिले के नेरचौक स्थित अटल मेडिकल एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी में ओबीसी छात्रों के लिए 20 अगस्त 2020 की अधिसूचना के तहत आरक्षण रोस्टर को लंबवत (वर्टिकली) लागू नहीं किया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए इस रोस्टर को सख्ती से लागू करने की मांग की थी। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ताओं ने शिकायत तो दर्ज की थी, लेकिन याचिका में अपनी बात को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत या आंकड़े पेश नहीं किए थे। मामले में जरूरी जानकारियों की कमी है। इसे देखते हुए याचिकाकर्ता ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि उन्हें सभी जरूरी आंकड़ों, तथ्यों और सटीक विवरणों के साथ नए सिरे से मामला दर्ज करने की स्वतंत्रता दी जाए। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने याचिकाकर्ताओं के इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका को वापस लेने के आधार पर खारिज कर दिया। अब याचिकाकर्ता ओबीसी आरक्षण के दावों को ठोस आंकड़ों के साथ दोबारा अदालत के समक्ष पेश कर सकेंगे।