हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन पर कब्जे नियमित करने वाले कानून को 23 साल बाद मनमाना और असांविधानिक घोषित करार करते हुए रद्द कर दिया है। अदालत ने हिमाचल भू-राजस्व अधिनियम की धारा 163-ए और उसके तहत बनाए नियम तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिए हैं। यह धारा प्रदेश सरकार को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को नियमित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देती थी। अदालत ने कहा कि सरकार अपनी संपत्ति की रक्षा करने के बजाय अनैतिकता को वैध बना रही है।

कोर्ट मूकदर्शक नहीं बन सकता। कोर्ट ने सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। साथ ही नियमितीकरण के तहत याचिका के लंबित रहने के दौरान या किसी भी अन्य आधार पर अतिक्रमण हटाने पर लगी किसी भी तरह की रोक या सुरक्षा को समाप्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि नगर निकायों और उनके अधिकारियों को अतिक्रमण की रिपोर्ट करने और उसे हटाने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को धारा 163 से उस प्रावधान को हटाने पर विचार करने को कहा है, जिसके तहत एक अतिक्रमणकारी विपरीत कब्जे के आधार पर जमीन पर मालिकाना हक का दावा कर सकता है।

 वर्ष 2002 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने हिमाचल प्रदेश भू राजस्व अधिनियम में एक नई धारा 163-ए जोड़ी। यह धारा सरकार को सरकारी भूमि पर अतिक्रमण को नियमित करने के लिए नियम बनाने की अनुमति देती है। इस नियम के तहत सरकार वंचित, कमजोर, जरूरतमंद और बेसहारा लोगों को सरकारी भूमि को नियमितिकरण करने का अधिकार देती है। प्रदेश में जिन लोगों ने सरकारी जमीन पर अधिक्रमण किया हुआ है, उनकी जमीन को नियमितिकरण का अधिकार देती है। सरकार वन भूमि आवंटित नहीं कर सकती, लेकिन यह धारा सरकारी जमीन को बेसहारा और गरीब लोगों को देने के लिए एक मात्र विकल्प थी।

 राज्य सरकार ने कहा कि धारा 163-ए को लाने का उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों की जोत को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाना और राजस्व उत्पन्न करना था। अदालत ने कहा कि धारा 163-ए के उद्देश्यों और कारणों के बयान में विरोधाभास है। एक ओर सरकार अतिक्रमण पर अंकुश लगाने के लिए धारा 163 के प्रावधानों को और अधिक सख्त बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर धारा 163-ए के माध्यम से अतिक्रमण को कानूनी रूप देने का प्रयास करती है, जिसे पहले हाईकोर्ट ने अवैध घोषित किया था। बता दें कि सरकार वर्ष 2017 के बाद पांच बीघा तक की सरकारी भूमि पर अतिक्रमण को नियमित करने के लिए ड्राफ्ट नियम राजपत्र में प्रकाशित कर लाई थी। हालांकि, नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट में स्पष्ट कर दिया था कि ऐसे कब्जे नियमित करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।