
हिमाचल प्रदेश में 1930-40 के दशक में रियासती राज और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध प्रजा मंडलों का गठन हुआ। इसमें प्रदेश की प्रत्येक रियासत में प्रजामंडल के तहत रियासतों की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध जनाक्रोश की आवाज बुलंद हुई। इसी आवाज में प्रजामंडल नेता नरसिंह दत्त शर्मा उर्फ भाऊ लीडर का नाम उस समय अग्रणी था। उनके अंग्रेजों और सुकेत रियासत के खिलाफ किए संघर्ष की कहानी आज कम लोग ही जानते हैं। नरसिंह दत्त शर्मा हिमाचल निर्माता एवं प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार के घनिष्ठ सहयोगी रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश के गठन के बाद भी नरसिंह दत्त शर्मा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। नरसिंह दत्त शर्मा को 1975 में स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए सरकार की ओर से ताम्रपत्र प्रदान किया गया। हालांकि नरसिंह दत्त का पुश्तैनी घर आज जीर्णशीर्ण अवस्था में है। इनका का जन्म अक्तूबर 1919 में पांगणा में भुविया राम के घर में हुआ। 1939 के प्रसिद्ध धामी गोलीकांड में पंडित सीता राम शर्मा के साथ नरसिंह दत्त शर्मा ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। इतिहास के जानकार डॉ. जगदीश शर्मा ने बताया कि डॉ. यशवंत सिंह परमार का सुकेत से गहरा संबंध रहा है। 1940 के दशक में डॉ. परमार प्रजामंडल के संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे। जब सुकेत में 14 अप्रैल 1945 को सुकेत प्रजामंडल की स्थापना हुई तो नरसिंह दत्त शर्मा प्रधान बने। इस अवधि में सुकेत में डॉ. यशवंत सिंह परमार निरंतर सुकेत आते रहे। यहां परमार का प्रवास नरसिंह दत्त शर्मा के घर में होता था। सुकेत सत्याग्रह की रूपरेखा यहीं बनती थी।
13 मई, 1930 को हरियाणा के गोहाना में धनेटा (हमीरपुर) के महाशय मथुरा दास नंदा के एक रैली में जारी भाषण को अंग्रेजों अफसरों ने रोकने की कोशिश की। अंग्रेज अधिकारियों ने उन पर लोगों को भड़काने का आरोप लगाया। लेकिन उन्होंने कहा कि आप मुझे रोक नहीं सकते, मैं कोई मुजरिम नहीं हूं और कहीं भाग नहीं रहा हूं। भाषण समाप्त होते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस द्वारा शिक्षा के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने गर्व से उत्तर दिया कि गुलाम मुल्क के एक गुलाम आदमी की कहां शिक्षा होती है। गिरफ्तारी के बाद भीड़ पुलिस ने उन्हें खतरनाक अपराधियों की तरह हथकड़ी-बेड़ियां पहना दीं। तब भी लोगों ने उन्हें पुष्पमालाओं से लाद दिया। मथुरा दास नंदा के बेटे योग प्रकाश नंदा कहते हैं कि उनके पिता कहते थे कि यह पल उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत क्षण था। 20 जून 1930 को उनको छह महीने की सजा सुनाई गई। वह महज 23 वर्ष की आयु में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद पड़े थे।
