
सोलन के आईसीएआर-मशरूम अनुसंधान निदेशालय (डीएमआर) के वैज्ञानिकों ने शटाके मशरूम की एक नई किस्म डीएमआरओ-18 विकसित की है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह बताई गई है कि इसे 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी उगाया जा सकेगा। इससे शटाके मशरूम की खेती के लिए ठंडे मौसम पर निर्भरता कम होने और गर्म व मैदानी इलाकों में भी इसकी खेती की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है।
करीब 60 दिन में तैयार होगी फसल
वैज्ञानिकों के अनुसार डीएमआरओ-18 करीब 60 दिन में फसल देने वाली किस्म है। इससे पहले शटाके मशरूम की खेती के लिए लगभग 18 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती थी। इस वजह से इसकी खेती मुख्य रूप से ठंडे क्षेत्रों तक सीमित रहती थी।
नई किस्म के 25 से 30 डिग्री तापमान में भी तैयार होने की क्षमता से गर्म इलाकों के किसानों के लिए शटाके मशरूम की खेती का नया रास्ता खुल सकता है।
आकार में बड़ी और चॉकलेट रंग की होगी नई किस्म
डीएमआरओ-18 की एक और खासियत इसका आकार और रंग बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह मशरूम पहले उपलब्ध किस्म की तुलना में बड़ा और मोटा होगा। इसका रंग आकर्षक चॉकलेट बताया गया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके बेहतर आकार और आकर्षक रंग के चलते बाजार में इसकी मांग और कीमत की संभावना बढ़ सकती है। इससे किसानों के लिए यह किस्म आर्थिक रूप से भी उपयोगी साबित हो सकती है।
औषधीय गुणों के कारण भी खास
शटाके मशरूम को पोषण और औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। डीएमआर के वैज्ञानिक डॉ. परमेश के अनुसार डीएमआरओ-18 स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी हो सकती है।
हालांकि मशरूम के किसी बीमारी के इलाज या दवा के विकल्प के रूप में इस्तेमाल को लेकर चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।
गर्म इलाकों के किसानों के लिए खुल सकता है नया रास्ता
वैज्ञानिकों द्वारा करीब 60 दिन में फसल देने वाली इस नई किस्म का सफल परीक्षण किया गया है। अब इसके व्यावसायिक उत्पादन और किसानों तक पहुंचाने की दिशा में आगे काम की उम्मीद है।
अगर 25 से 30 डिग्री तापमान में इसका उत्पादन व्यावहारिक रूप से सफल रहता है, तो शटाके मशरूम की खेती का दायरा हिमाचल के ठंडे क्षेत्रों से आगे बढ़कर देश के गर्म और मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है। सोलन स्थित मशरूम अनुसंधान निदेशालय की यह नई किस्म मशरूम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए एक नई संभावना लेकर आई है।
