हिमाचल सरकार के लिए नालागढ़ में मेडिकल डिवाइस पार्क बनाने की राह आसान नहीं है। उद्योग विभाग के पास इतना पैसा नहीं है कि वह इस पार्क का निर्माण कर सके। इसको लेकर विभाग ने पहले ही स्थिति स्पष्ट कर चुका है। दूसरे, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने डिवाइस पार्क के लिए फाॅरेस्ट क्लीयरेंस दी है। अगर उद्योग विभाग जमीन पर प्लॉट बनाकर उद्योगपतियों को लीज पर देता भी है तो ऐसी स्थिति में उद्योगपतियों जमीन पर फार्मा उद्योग ही स्थापित करने होंगे।

हाल ही में मंत्रिमंडल की बैठक में इस मामले पर विस्तृत चर्चा हुई है। उद्योग विभाग ने सरकार के समक्ष चार ऑप्शन रखे हैं। इसमें पार्क बनाने के लिए या तो सरकार पैसा दे या फिर इसका निर्माण कार्य पीपीपी मोड पर किया जा सकता है। इसके अलावा विभाग कुछ जमीन लीज पर देकर एकत्र राशि से पार्क का निर्माण कर सकता है। प्रदेश सरकार ने इसको लेकर उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान की अध्यक्षता में हाईपावर कमेटी गठित की है। कमेटी पहले नालागढ़ डिवाइस पार्क जमीन का निरीक्षण करेगी। उसके बाद सचिवालय में उद्योग विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक होगी। फिर मामले को दोबारा से कैबिनेट की बैठक में लाया जाएगा। उसके बाद ही इस पर निर्णय लिया जाना है। उल्लेखनीय है कि नालागढ़ के मझौली में 1,623 बीघा जमीन पर मेडिकल डिवाइस पार्क बनाया जाना है। इसमें मेडिकल डिवाइस पार्क पर 349 करोड़ रुपये व्यय होने हैं। अभी तक जमीन समतल करने में 134 करोड़ रुपये व्यय हो चुके हैं।

उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि कैबिनेट की बैठक में चार विकल्प सुलझाए गए हैं। अब नालागढ़ में मेडिकल डिवाइस पार्क का दौरा किया जाना है। उसके बाद रिपोर्ट तैयार कर कैबिनेट की बैठक में लाई जाएगी।

प्रदेश सरकार पहले ही केंद्र को 30 करोड़ रुपये लौटा चुकी है। केंद्र सरकार ने मेडिकल डिवाइस पार्क के लिए हिमाचल को 100 करोड़ रुपये देने थे। शेष 70 करोड़ रुपये बाद में मिलने थे। इसको लेकर केंद्र ने शर्त रखी थी कि पार्क में निवेशकों को एक रुपये लीज पर जमीन दी जाए, बिजली तीन रुपये प्रति यूनिट पर और पानी-निशुल्क उपलब्ध कराया जाए। प्रदेश सरकार को शर्त मंजूरी नहीं थी।