लाहौल-स्पीति। हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी के बागवानों के लिए इस बार सेब का सीजन काफी अच्छा रहा है। बाजार में लाहौल के सेब को शानदार दाम मिले हैं। 20 किलो की एक पेटी 1300 से 1500 रुपये तक बिकी है। वहीं, घाटी में करीब 90 फीसदी सेब की तुड़ान पूरी हो चुकी है और अब बागवान ग्रेडिंग व पैकिंग के काम में जुटे हैं।

इस बार शिमला और कुल्लू में सेब की पैदावार कम रहने का फायदा लाहौल के बागवानों को मिला है। उत्पादकों के अनुसार लाहौल का सेब गुणवत्ता के मामले में बेहतर है। इसका छिलका मोटा और फल रसदार होता है, जिस कारण इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है।

1000 हेक्टेयर से अधिक पहुंचा सेब उत्पादन का क्षेत्र

बागवानी विभाग के अनुसार लाहौल घाटी में सेब की खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। शुरुआती वर्षों में यहां करीब 450 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती होती थी और उत्पादन लगभग 125 मीट्रिक टन था। अब हर साल करीब 60 हजार नए पौधे लगाए जा रहे हैं, जिससे लगभग 120 हेक्टेयर नए क्षेत्र में बागवानी का विस्तार हो रहा है।

वर्तमान में पट्टन घाटी सेब उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हो चुकी है। जिले में सेब का कुल रकबा 1000 हेक्टेयर से अधिक हो गया है, जबकि सालाना उत्पादन करीब 3000 से 4000 मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहे सेब की खेती के अवसर

जलवायु परिवर्तन के चलते अब लाहौल के उन क्षेत्रों में भी सेब की खेती संभव हो रही है, जिन्हें पहले इसके लिए अनुकूल नहीं माना जाता था। इससे आने वाले समय में उत्पादन और बागवानी क्षेत्र में और विस्तार की उम्मीद है।

लाहौल एप्पल को अलग ब्रांड पहचान देने की मांग

अच्छे उत्पादन और गुणवत्ता के बावजूद लाहौल के सेब को देश की प्रमुख मंडियों में अभी तक अलग पहचान नहीं मिल पाई है। बागवानों का कहना है कि कई जगह उनके उत्पाद को किन्नौर एप्पल के नाम से बेचा जा रहा है।

ऐसे में बागवानों ने सरकार और बागवानी विभाग से लाहौल एप्पल के नाम से अलग ब्रांड विकसित करने की मांग उठाई है। उनका मानना है कि अलग ब्रांड पहचान मिलने से बाजार में लाहौल के सेब की विशिष्ट पहचान बनेगी और उत्पादकों को उनकी मेहनत का बेहतर दाम मिल सकेगा।

वहीं, एपीएमसी कुल्लू एवं लाहौल-स्पीति के सचिव दीक्षित जरियाल के अनुसार घाटी में सेब सीजन अब अंतिम चरण में है और करीब 10 फीसदी तुड़ान बाकी है।