
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में चल रहे प्रमुख हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्टों को सरकार के नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया में हो रही देरी पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर संबंधित कंपनियों के साथ बैठक कर टेकओवर प्रक्रिया की स्पष्ट और लिखित टाइमलाइन तय करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह आदेश एनएचपीसी लिमिटेड और एसजेवीएन लिमिटेड की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान पारित किया। मामले की अगली सुनवाई एक अक्तूबर को होगी।
सुनवाई के दौरान कंपनियों ने अदालत को बताया कि टेकओवर का प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बावजूद उन्हें निर्माण कार्य जारी रखना पड़ रहा है। प्रक्रिया में देरी के कारण परियोजनाओं की निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है। साथ ही ठेकेदारों से जुड़ी कानूनी और वित्तीय देनदारियों का जोखिम भी कंपनियों पर बना हुआ है। इससे भविष्य में परियोजनाओं के हस्तांतरण की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है। एसजेवीएन की ओर से ऊर्जा निदेशालय के उस पत्र का भी विरोध किया गया, जिसमें कंपनी पर टेकओवर प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगाया गया था। कंपनी ने अदालत के समक्ष दस्तावेज पेश कर आरोपों को बेबुनियाद बताया
यह मामला एनएचपीसी को आवंटित 500 मेगावाट के डुगर हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट और एसजेवीएन के लूहरी स्टेज-1, सुन्नी बांध परियोजना और धौलासिद्ध प्रोजेक्ट से जुड़ा है। राज्य सरकार ने इन परियोजनाओं को अपने नियंत्रण में लेने का निर्णय लिया है। वर्ष 2025 में कंपनियों ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए मांग की थी कि या तो सरकार उनके साथ पहले तय शर्तों को बहाल करे या अब तक हुए खर्च की ब्याज सहित भरपाई कर परियोजनाओं को खुद अपने हाथ में ले लें। अप्रैल 2025 में राज्य सरकार ने परियोजनाओं को टेकओवर करने और अब तक हुए खर्च के मूल्यांकन के लिए स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता नियुक्त करने का फैसला किया।
