पंजाब नेशनल बैंक की ढालपुर शाखा (कुल्लू) में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किसान फसल ऋण (केसीसी लोन) जारी करने के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने पूर्व मैनेजर अमर सिंह बोध (काजा) को तीन साल के कठोर कारावास और 45 हजार जुर्माने की सजा सुनाई है। उसके सहयोगी ताशी फुंचोग (भुंतर) को चार साल की कैद और 45 हजार जुर्माने की सजा सुनाई। दोनों को जुर्माना अदा न करने पर तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

विशेष सीबीआई न्यायाधीश डॉ. परविंदर सिंह अरोड़ा की अदालत ने यह फैसला चालान संख्या-41 में सुनाया। यह मामला पंजाब नेशनल बैंक मंडी सर्कल की ढालपुर शाखा में वर्ष 2010 से 2012 के बीच 1.83 करोड़ के 41 केसीसी ऋण जारी करने से जुड़ा है, जो फर्जी राजस्व रिकॉर्ड और जाली गैर-भार प्रमाण पत्र (एनईसी) के आधार पर स्वीकृत किए गए। मंडी सर्कल प्रमुख राजीव खन्ना की शिकायत पर 11 अप्रैल 2015 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) शिमला शाखा ने अमर सिंह बोध सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया।

जांच में सामने आया कि बैंक अधिकारी और उनके सहयोगी ने निरत राम के नाम पर भी 4 लाख का ऋण स्वीकृत किया। आवेदन फर्जी जमाबंदी और जाली दस्तावेजों पर आधारित था, साथ ही बैंक के तत्कालीन वरिष्ठ प्रबंधक ऋणों को स्वीकृत करने के लिए प्रेरित किया। अभियोजन पक्ष के मुताबिक दोषी अमर सिंह बोध के खिलाफ अन्य 37 चार्जशीट अभी लंबित हैं। इससे पहले भी इसी घोटाले से जुड़ी तीन चार्जशीटों में पांच आरोपियों को सजा हो चुकी है। यह फैसला बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है।

आरोप पत्र के मुताबिक मृतक निरत राम ने स्वयं का नाम टारजन बताकर साल 2010 को 4 लाख रुपये के केसीसी ऋण के लिए आवेदन किया। यह आवेदन फर्जी जमाबंदी 2011 के आधार पर किया गया। जो पटवारी, पटवार सर्कल जनाह, कुल्लू की ओर से जारी की गई। इसके बाद उसके बैंक खाते में धनराशि स्थानांतरित कर वितरित की गई। इसी दौरान बैंक की ऑडिट रिपोर्ट में 1.83 करोड़ रुपये का यह घोटाला उजागर हुआ। जांच में पाया गया कि ऋण प्रबंधक एएस बोध ने तहसीलदार को बैंक के पक्ष में उपरोक्त भूमि पर प्रभार सृजन की आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजा। बैंक के सूचीबद्ध अधिवक्ता के माध्यम से एनईसी जारी की गई। पटवारी की रिपोर्ट में उक्त भूमि पर मृतक निरत राम का स्वामित्व गलत तरीके से दर्शाया गया था।