कोलेडोकल सिस्ट की समय पर पहचान और इलाज न किया जाए तो यह कैंसर में बदल सकता है। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) में हुए शोध में इसका खुलासा हुआ है। पित्त नली (बाइल डक्ट) में बनने वाले कोलेडोकल सिस्ट रोग की समय रहते पहचान हो जाए तो इसे कैंसर बनने से रोका जा सकता है। ऑपरेशन से मरीजों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोलेडोकल सिस्ट का समय पर इलाज न किया जाए तो यह कैंसर में बदल सकता है।

इस रोग से ग्रस्त मरीजों में कैंसर का खतरा 15 से 28 फीसदी तक होता है। अगर किसी को बार-बार पेट दर्द, पीलिया या लगातार उल्टी की शिकायत है तो इसे साधारण पथरी या पाचन समस्या समझकर नजरअंदाज न करें। सही समय पर जांच और ऑपरेशन से गंभीर खतरे से बचा जा सकता है। अध्ययन में यह भी खुलासा हुआ है कि कई मरीजों का पहले पित्ताशय (गॉलब्लैडर) का ऑपरेशन हो चुका था, लेकिन उस दौरान कोलेडोकल सिस्ट की पहचान नहीं हो पाई। बाद में समस्या गंभीर हो गई। इस बीमारी की पहचान करना आसान नहीं है।

कई बार आधुनिक तकनीक एमआरसीपी भी सही परिणाम नहीं दे पाती। अध्ययन में एक मामला ऐसा भी मिला जहां एमआरसीपी रिपोर्ट में टाइप-6 कोलेडोकल सिस्ट को टाइप-4ए मान लिया गया, जबकि असली स्थिति का पता ऑपरेशन के दौरान चला। डॉक्टरों के अनुसार यही सबसे बड़ी चुनौती है कि गलत वर्गीकरण के कारण इलाज में देरी हो जाती है। यह शोध इंटरनेशनल सर्जरी जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोध आईजीएमसी शिमला के डॉ. विपन कुमार, डॉ. रशपाल सिंह, डॉ. आशीष चौहान, डॉ. सोहिल चौहान, डॉ. नवम धीमान, डॉ. सुनील शर्मा और डॉ. बलवंत नेगी के सहयोग से हुआ।

शोध 31 वयस्क मरीजों पर आधारित रहा। चला कि यह रोग महिलाओं में ज्यादा देखने को मिला। मरीजों की औसत उम्र 37 साल रही। जबकि सबसे कम उम्र का मरीज 16 साल और सबसे अधिक उम्र का 73 साल था। ज्यादातर लोग ऊंचाई वाले ग्रामीण इलाकों से आए थे और उन्होंने शुरुआत में पेट दर्द, उल्टी और पीलिया जैसी शिकायतें बताईं।

आईजीएमसी में 31 में से 26 मरीजों की सर्जरी की गई। इनमें अधिकतर का इलाज रू-एन-वाई हेपेटिको-जेयूनोस्टोमी तकनीक से हुआ। इसमें पित्त नली को आंत से जोड़ा जाता है। दो मरीजों में ऊतक चिपके होने के कारण विशेष लिली तकनीक का सहारा लेना पड़ा। पांच मरीजों को उनकी उम्र और दूसरी बीमारियों के चलते ऑपरेशन की बजाय दवाओं पर रखा गया।

सर्जरी के बाद लगभग 30 फीसदी मरीजों में शुरुआती दिनों में हल्की समस्याएं आईं, जैसे बाइल लीक या पैंक्रियाटिक लीक, लेकिन सभी को दवाओं और निगरानी से ठीक कर लिया गया। औसतन मरीज सात दिन में अस्पताल से डिस्चार्ज हुए और लंबे समय के फॉलोअप में वे स्वस्थ पाए गए। राहत की बात यह रही कि किसी भी मरीज की मौत नहीं हुई।