
हिमाचल प्रदेश में तैयार की जा रही सिंगल बैरल बंदूकें लोगों की पसंद बनती जा रही हैं। प्रदेश में जिला मंडी और कांगड़ा में लगे उद्योगों में इन बंदूकों को तैयार किया जा रहा है। हिमाचल के अलावा बाहरी राज्यों में भी इन बंदूकों की सप्लाई है। वर्ष 2012-13 में जहां 1640 बंदूकें बनाई जाती थीं, वहीं अब वर्ष 2024-25 में बंदूकों का कारोबार बढ़कर 2730 हो गया है। डबल बैरल बंदूकों का उत्पाद घटा है। वर्ष 2023-24 में जहां 111 बंदूकें तैयार की गईं, वहीं वर्ष 2024-25 में 90 बंदूकों का उत्पादन हुआ है।
फसलों को बचाने के लिए किसानों को बंदूक का जिला प्रशासन की ओर से लाइसेंस जारी किया जाता है। जंगली जानवरों को मारना कानूनी अपराध है। डराने के लिए ही इसे इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हिमाचल में चुनावी दौर में इन बंदूकों को जिला प्रशासन कार्यालय में जमा करना होता है। बंदूकों की कीमत 60 हजार रपुये से शुरू होती है। अन्य राज्यों की अपेक्षा हिमाचल में बंदूक के लाइसेंस लेने के सख्त नियम हैं। पहले फॉरेस्ट से क्लीयरेंस लेनी होती है। उसके बाद पटवारी की रिपोर्ट अनिवार्य की गई है। यह इसलिए कि अगर किसी ने सरकारी जमीन में अतिक्रमण किया है उन्हें यह लाइसेंस नहीं मिलता है।
सेल्फ प्रोटेक्शन के लिए इसका लाइसेंस दिया जाता है। लाइसेंस मिलने के बाद भी एक सप्ताह का प्रशिक्षण अनिवार्य किया गया है। हिमाचल में नियम सख्त होने के कारण इन बंदूकों की सप्लाई ज्यादातर दूसरे राज्यों के लिए होती है। फल फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने कहा कि किसान बागवानों के लिए बंदूक रखने के लिए नियमों में ढील दी जानी चाहिए। जंगली जानवर फसलों को नुकसान पहुंच रहे हैं। जंगल के साथ रहने वाले लोगों को प्रोटेक्शन करने के लिए लाइसेंस के नियम सरल होनी चाहिए।
वर्षवार बंदूक उत्पादन
वर्ष उत्पादन
2012-13 1640
2013-14 1786
2014-15 2814
2015-16 1316
2016-17 1256
2017-18 885
2018-19 659
2019-20 776
2020-21 850
2021-22 1640
2022-23 1870
2023-24 2080
2024-25 2730
