
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 33 के तहत किसी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि संबंधित वन को विधिवत अधिसूचित न किया गया हो और उस अधिसूचना का प्रचार स्थानीय लोगों के बीच न किया गया हो। अदालत ने कहा कि जब आरोपपत्र में यह स्पष्ट करने के लिए कोई अधिसूचना नहीं दी गई हो कि अतिक्रमण की गई भूमि आरक्षित वन है, तो किसी व्यक्ति को भारतीय वन अधिनियम के तहत उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने कहा कि आरोप पत्र में इस बात का उल्लेख नहीं है कि कोई अधिसूचना जारी की गई थी कि जिस जंगल में अतिक्रमण किया गया था, वह आरक्षित वन था।
भारतीय वन अधिनियम 1927 की धाराएं 32 और 33 वनों के प्रबंधन और संरक्षण से संबंधित हैं। धारा 32 राज्य सरकार को संरक्षित वनों के लिए नियम बनाने का अधिकार देती है, जिसमें संसाधन उपयोग, शिकार और वन संरक्षण जैसे पहलू शामिल हैं। धारा 33 में धारा 32 के तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है। याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 447 के तहत अतिक्रमण तथा भारतीय वन अधिनियम की धारा 32 और 33 के तहत वन भूमि पर अतिक्रमण का आरोप लगाया गया था। निचली अदालत ने टिप्पणी की कि प्राथमिकी केवल उसी व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज की जा सकती है, जिसने 10 बीघा से अधिक सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया हो। निचली अदालत ने अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया और कहा कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई अभियोग पत्र तैयार नहीं किया जा सकता
प्रदेश हाईकोर्ट में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की पेंशन को लेकर सरकार ने अनुपालना रिपोर्ट दाखिल की है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने इस मामले की सुनवाई की। 21 मई 2025 को तत्कालीन न्यायमूर्ति तरलोक चौहान और न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा ने राज्य सरकार को 12 अधिसूचना की पुनः समीक्षा करने और उसमें संशोधन करने का निर्देश दिया था। इस अधिसूचना के अंतर्गत सार्वजनिक सेवा आयोग के गैर-आधिकारिक अध्यक्षों और सदस्यों को पेंशन का प्रावधान था।
अदालत ने कहा था कि पेंशन की राशि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) से जोड़ी जाए और इसे केरल उच्च न्यायालय के निर्णय की तर्ज पर संशोधित किया जाए। इसे लेकर आयोग के पूर्व अध्यक्ष केएस तोमर ने 2020 में एक याचिका दायर की थी। खंडपीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने यह भी उल्लेख किया था कि 12 मार्च 2004 की अधिसूचना से पेंशन व्यवस्था तो लागू हुई थी, लेकिन महंगाई में भारी बढ़ोतरी के बावजूद इसे कभी संशोधित नहीं किया गया। आदेश में कहा गया था कि, यह विवादित नहीं है कि अध्यक्ष और सदस्य हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग (सदस्य) विनियम, 1974 के तहत पेंशन पाने के हकदार हैं।
इन परिस्थितियों में हम यह उचित समझते हैं कि राज्य सरकार उक्त अधिसूचना की पुनः समीक्षा करे और सीपीआई तथा केरल उच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में रखकर संशोधित करे। इधर, पूर्व अध्यक्ष केएस तोमर ने अनुपालना रिपोर्ट की सामग्री पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा पूर्व जयराम ठाकुर सरकार ने टालमटोल की नीति अपनाई थी, इसलिए उन्हें न्याय पाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। वर्तमान सरकार ने कम से कम इसे सुलझाने की कोशिश की है, हालांकि उनकी प्राथमिकता केरल पैटर्न थी, जिसमें संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप पेंशन राशि तय की गई है। यह फैसला किसी व्यक्तिगत स्तर का नहीं है, बल्कि देश के किसी भी लोक सेवा आयोग की ओर से अपनाया जा सकता है।
