टांडा: हिमाचल प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल टांडा में आवश्यक दवाओं की भारी कमी सामने आई है। अस्पताल में डायबिटीज की दवा वोग्लिबोज पिछले 300 दिनों से और कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवा फेनोफाइब्रेट पिछले 242 दिनों से उपलब्ध नहीं है। वहीं कई अन्य जरूरी दवाएं भी महीनों से स्टॉक से बाहर हैं, जिससे मरीजों को निजी मेडिकल स्टोरों से महंगे दामों पर दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

29 जून को जारी महालेखाकार (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि अस्पताल के दवा भंडार में कई जीवनरक्षक और नियमित उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं 26 दिन से लेकर 300 दिन तक उपलब्ध नहीं रहीं। रिपोर्ट के अनुसार वोग्लिबोज 300 दिन, डेसिरॉक्स 250 एमजी 255 दिन, फेनोफाइब्रेट 242 दिन, ओन्डासेट सिरप 166 दिन, इंजेक्शन फैक्टर-4 161 दिन, प्रेडनिसोलोन 149 दिन, एटोरिकॉक्सिब 137 दिन तथा डॉक्सोफिलिन 35 दिनों से स्टॉक से बाहर है।

इन दवाओं का उपयोग मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल, अस्थमा, एलर्जी, थैलेसीमिया, संक्रमण, गठिया और रक्तस्राव जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में किया जाता है। इनमें से डेसिरॉक्स और इंजेक्शन फैक्टर-4 जैसी दवाएं केवल सरकारी सप्लाई के माध्यम से उपलब्ध होती हैं और निजी मेडिकल स्टोरों पर नहीं मिलतीं। ऐसे में इन दवाओं पर निर्भर मरीजों की परेशानी और बढ़ गई है।

महंगी पड़ रही है बीमारी

दवाएं सरकारी अस्पताल में उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को निजी दुकानों से इन्हें खरीदना पड़ रहा है। बाजार में फेनोफाइब्रेट का एक पत्ता करीब 160 रुपये, ओन्डासेट सिरप करीब 35 रुपये, वोग्लिबोज की एक गोली लगभग 15 रुपये, डॉक्सोफिलिन करीब 6 रुपये प्रति गोली, एटोरिकॉक्सिब करीब 12 रुपये प्रति गोली, प्रेडनिसोलोन करीब 2 रुपये प्रति गोली और एमॉक्सी 500 एमजी करीब 15 रुपये प्रति कैप्सूल में मिल रही है। इससे नियमित इलाज कराने वाले मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

अस्पताल में लंबे समय से जरूरी दवाओं की कमी ने दवा खरीद और आपूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मरीजों और उनके परिजनों ने मांग की है कि आवश्यक दवाओं की जल्द आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, ताकि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने वाले लोगों को निजी दुकानों पर निर्भर न रहना पड़े।