
हिमाचल प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों को नशे के चंगुल से मुक्त करने के लिए कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएं विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। प्रदेश की जेलों में वर्तमान में 42 फीसदी कैदी एनडीपीएस एक्ट के तहत सजा काट रहे हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए कारागार विभाग ने प्रदेश सरकार, उच्च न्यायालय और केंद्रीय गृह सचिव के समक्ष कैदियों के पुनर्वास और नशा मुक्ति के लिए ठोस पहल करने का मामला उठाया है। जेलों में कैदियों के लिए डि-एडिक्शन प्रोग्राम को प्रभावी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। सभी प्रमुख जेलों में स्थायी तौर पर डॉक्टरों की तैनाती की जाएगी, ताकि कैदियों को नियमित नशा मुक्ति उपचार उपलब्ध हो सके।
मनोवैज्ञानिक परामर्श, काउंसलिंग और आवश्यक दवाइयों की सुविधा भी दी जाएगी। कैदियों को नशे से दूर करना न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए बल्कि समाज में उनकी पुनर्वास के लिए भी जरूरी है। इस पहल के बाद कैदियों को सुधारात्मक गतिविधियों और कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ने की भी योजना है, जिससे रिहाई के बाद वे समाज में सामान्य जीवन जी सकें। हिमाचल प्रदेश में कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएं विभाग के तहत 14 जेलों का संचालन किया जा रहाहै। दो सेंट्रल जेल कंडा और नाहन, नौ जिला जेल कैथू, बिलासपुर, मंडी, कुल्लू, हमीरपुर, धर्मशाला, ऊना, सोलन और चंबा के अलावा तीन सब जेल नालागढ़, कल्पा और नूरपुर में इस समय करीब 2850 कैदी सजा काट रहे हैं। इनमें 1024 अपराधी, 1809 अंडरट्रायल और 18 हिरासत में हैं।
ऐसे कैदी जो नशे के चंगुल में फंसे हैं सजा पूरी करने के बाद सकारात्मक बदलाव के साथ समाज में लौट सकें इस उद्देश्य से जेलों में कैदियों की डि-एडिकशन के लिए स्थायी तौर पर डॉक्टरों की तैनाती का प्रयास किया जा रहा है। इसे लेकर उच्च न्यायालय को सूचित किया गया है और प्रदेश सरकार से सुविधा उपलब्ध करवाने का आग्रह किया गया है। केंद्रीय गृह सचिव के समक्ष भी यह मामला उठाया गया है। – अभिषेक त्रिवेदी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएं)
