
शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। पिछले दस वर्षों के आंकड़ों से पता चला है कि पेंशन व्यय में वृद्धि की रफ्तार राज्य के राजस्व व्यय और अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर से अधिक रही है। एक शोधपत्र में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में प्रदेश के कुल राजस्व व्यय में पेंशन की हिस्सेदारी 14.73 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 21.36 प्रतिशत हो गई। इससे राज्य के बजट पर बढ़ते वित्तीय दबाव को लेकर चिंता जताई गई है।
10 वर्षों में तेजी से बढ़ा पेंशन खर्च
डॉ. अनिल कुमार के शोधपत्र लॉन्ग-टर्म फिस्कल सस्टेनेबिलिटी इम्प्लिकेशंस ऑफ पेंशन लायबिलिटीज इन हिमाचल प्रदेश: ए ट्रेंड एंड फिस्कल स्ट्रेस एनालिसिस में वर्ष 2014-15 से 2024-25 तक के वित्तीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।
शोध के मुताबिक, इस अवधि में पेंशन व्यय की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर 12.75 प्रतिशत रही। इसके मुकाबले राज्य के राजस्व व्यय में 9.43 प्रतिशत और सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में 7.90 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर्ज की गई।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था और कुल राजस्व व्यय की तुलना में पेंशन पर होने वाला खर्च तेजी से बढ़ा है।
राजस्व व्यय में पेंशन की हिस्सेदारी 21.36 फीसदी
शोधपत्र में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 में कुल राजस्व व्यय का 14.73 प्रतिशत हिस्सा पेंशन भुगतान पर खर्च होता था। वर्ष 2024-25 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 21.36 प्रतिशत हो गई।
इसका मतलब है कि राज्य सरकार के राजस्व व्यय का पांचवें हिस्से से अधिक अब पेंशन भुगतान में जा रहा है। शोध में वित्तीय दबाव अनुपात 1.35 आंका गया है, जो पेंशन देनदारियों की अपेक्षाकृत तेज वृद्धि की ओर संकेत करता है।
जीएसडीपी के मुकाबले भी बढ़ा पेंशन का बोझ
पेंशन खर्च में वृद्धि का असर राज्य की अर्थव्यवस्था के अनुपात में भी दिखाई दे रहा है। शोध के मुताबिक, वर्ष 2014-15 में जीएसडीपी के मुकाबले पेंशन व्यय 2.34 प्रतिशत था, जो वर्ष 2024-25 में बढ़कर 3.75 प्रतिशत हो गया।
अध्ययन में कहा गया है कि यदि पेंशन देनदारियां इसी तरह तेजी से बढ़ती रहीं, तो आने वाले वर्षों में सरकार के लिए पेंशन भुगतान और अन्य सार्वजनिक खर्चों के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास कार्यों पर पड़ सकता है दबाव
शोधपत्र के अनुसार, पेंशन जैसी अनिवार्य देनदारियों पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होने से स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास से जुड़ी योजनाओं के लिए उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, इन क्षेत्रों के बजट पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा है, इसका आकलन करने के लिए अलग से विस्तृत बजटीय आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी होगा।
अध्ययन में राज्य की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए राजस्व बढ़ाने और सरकारी खर्च के बेहतर प्रबंधन की रणनीति अपनाने की जरूरत बताई गई है।
पेंशन फंड बनाने की जरूरत पर जोर
प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व वित्त सचिव डॉ. श्रीकांत बाल्दी ने पेंशन व्यवस्था के वित्तीय प्रबंधन को लेकर पेंशन फंड बनाने की जरूरत पर जोर दिया है।
उनके अनुसार, पुरानी पेंशन योजना (OPS), एकीकृत पेंशन योजना (UPS) या राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में से कोई भी व्यवस्था हो, राज्य में पेंशन फंड का गठन महत्वपूर्ण है।
उन्होंने बताया कि पुरानी पेंशन योजना गैर-अंशदायी व्यवस्था है, जबकि यूपीएस और एनपीएस अंशदायी व्यवस्थाएं हैं। उनके विचार में अंशदान आधारित व्यवस्था के माध्यम से भविष्य की पेंशन देनदारियों का वित्तीय प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
क्या है पूरे मामले का निष्कर्ष?
हिमाचल प्रदेश में पेंशन भुगतान सरकारी कर्मचारियों के सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं, पिछले दस वर्षों में पेंशन व्यय की तेज वृद्धि राज्य के वित्तीय प्रबंधन के सामने एक बड़ी चुनौती भी पेश कर रही है।
शोध के आंकड़े बताते हैं कि भविष्य में पेंशन भुगतान सुनिश्चित करने के साथ-साथ विकास योजनाओं के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रखना भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए राजस्व बढ़ाने, खर्चों का बेहतर प्रबंधन करने और दीर्घकालिक वित्तीय योजना तैयार करने पर ध्यान देना जरूरी है।
