बदलते परिवेश के साथ-साथ मिंजर मेले का स्वरूप भी बदल चुका है। चंबा के तत्कालानी शासक साहिल वर्मन की जीत के बाद खुशी और समृद्धि के प्रतीक के रूप में तीन दिन तक मिंजर मेला मनाया जाने लगा। मेले के अंतिम दिन चंबा के शासक हाथी पर सवार होकर जबकि अन्य चुनिंदा सेना के अधिकारी, पदाधिकारी और प्रजा पैदल मंजरी गार्डन तक मिंजर विसर्जित करने के लिए जाते थे।

अब मिंजर मेले का स्वरूप बदल चुका है। मिंजर मेले में हाथी के बजाय वाहन या पैदल ही शोभायात्रा निकलती है। शोभायात्रा में विभिन्न सांस्कृतिक दल, देव चिह्नों की पालकियों समेत असंख्य लोग मिंजर विसर्जन को जाते हैं। मेला तीन के बजाय आठ दिन तक मनाया जा रहा है।

मिंजर मेला 935 ईस्वी में चंबा के राजा की त्रिगर्त (अब कांगड़ा) के शासक पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चंबा के शासक त्रिगर्त पर विजय प्राप्त कर जब वापस अपनी रियासत लौटे तो चुवाड़ी में प्रजा की ओर से मक्के और धान की बालियां मिंजर के रूप में उन्हें जीत पर भेंट की गईं। खुशी और समृद्धि का प्रतीक मिंजर मेला तब से मनाया जाने लगा।

पद्मश्री विजय शर्मा ने बताया कि 1919 में चंबा के शासक भूरि सिंह की मृत्यु के बाद राजा राम सिंह भी हाथी पर सवार होकर मिंजर विसर्जन को जाते रहे हैं। अब मिंजर विसर्जन में हाथी देखने को नहीं मिलता है। समय के साथ-साथ मिंजर मेले में काफी बदलाव हुए हैं।