
हिमाचल प्रदेश में टमाटर की फसल ग्रीन हाउस गैसों को हटाने में मददगार साबित हो रही है। यहां उगाई जाने वाली सभी सब्जियों की बात करें तो इनमें टमाटर सबसे अधिक मात्रा में कार्बन अवशोषक बन रहा है। उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल से फसलों में कार्बन की मात्रा बहुत अधिक बढ़ गई है। इसका अवशोषण कम होने पर कार्बन डाईऑक्साइड, मीथेन जैसी गैसें वातावरण में खूब घुल रही हैं। कार्बन फुटप्रिंट विश्लेषण में फसल उत्पादन के सभी चरणों को शामिल किया गया और बुवाई से लेकर कटाई तक अध्ययन किया गया।
टमाटर, शिमला मिर्च, फूलगोभी, मटर और फ्रेंच बीन्स जैसी फसलों पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। डॉ. वाईएस परमार वागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना के विशेषज्ञों की ओर से सब्जियों पर जलवायु परिवर्तन पर किए अध्ययन में यह बातें सामने आई हैं। यह शोध पत्र एल्सवीयर साइंस ऑफ द टोटल एन्वायरन्मेंट नामक अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस शोध अध्ययन में डॉ. प्रदीप सिंह, डॉ. मनोज कुमार वैद्य, डॉ. अमित गुलेरिया, डॉ. प्रदीप कुमार अधाले आदि ने हिस्सा लिया। अध्ययन के अनुसार वर्तमान में टमाटर की फसल जलवायु परिवर्तन में एक जटिल और दोहरी भूमिका निभा रही है।
एक ओर यह अपने बड़े बायोमास के कारण महत्वपूर्ण कार्बन अवशोषक के रूप में कार्य कर रही है, वहीं दूसरी ओर गहन कृषि पद्धतियों के कारण यह उत्सर्जन में भी योगदान देती है। उन्होंने कहा कि टमाटर की फसल ने चयनित फसलों में सबसे अधिक कार्बन पृथक्करण यानी 197 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज किया, जो सभी समूहों में औसत 183.82 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। यह इसे सबसे अधिक कार्बन-पृथकरण करने वाली फसल बनाता है। इसका अर्थ है कि टमाटर पौधे प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और इसे अपने बायोमास यानी तना, पत्तियां और फल में संग्रह करने में अत्यधिक कुशल हैं। टमाटर कार्बन सिंक के रूप में कार्य करता है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों को हटाने में मदद मिलती है। उच्च पृथक्करण दरों के बावजूद टमाटर और शिमला मिर्च जैसी फसलें कम टिकाऊ प्रथाओं को दर्शाती हैं, जो गहन आदान उपयोग का कारण है।
