
भारत-बांग्लादेश के बीच पिछले एक-डेढ़ साल से चल रहे तनाव के चलते हिमाचल में तैयार होने वाले रेड गोल्डन सेब का कारोबार इस बार बुरी तरह पिट गया है। हालांकि, पड़ोसी मुल्क नेपाल अभी भी सेब की इस पॉलिनाइजर किस्म का मुख्य खरीदार है। हिमाचल के रेड गोल्डन सेब के सिर्फ बांग्लादेश और नेपाल ही खरीदार हैं। देश में भी इस सेब की मांग ज्यादा नहीं है। यहां तैयार होने वाली रेड गोल्डन की 80 फीसदी फसल इन दोनों देशों को ही निर्यात होती थी। नेपाल और बांग्लादेश की वजह से ही पिछले 10-12 साल से इस फसल की मार्केट बढ़ी थी। इस कारण इस सेब को दाम भी अच्छे मिलने लगे थे। दो साल पहले तक बांग्लादेश के साथ जब भारत के संबंध मधुर थे, तब सेब से लदे प्रति ट्रक पर बांग्लादेश करीब 15 हजार रुपये ड्यूटी वसूलता था, अब इसे डेढ़ लाख रुपये कर दिया गया है।
इससे खरीदारों को नुकसान हो रहा था। यही कारण है कि इस बार बांग्लादेश के व्यापारी हिमाचल में सेब खरीदने नहीं पहुंचे। हिमाचल की सेब आर्थिकी का करीब आठ फीसदी हिस्सा इसी रेड गोल्डन किस्म से हासिल होता है। रेड गोल्डन की यह पॉलिनाइजर किस्म रेड गोल्डन रॉयल और अन्य रेड डिलीशियस किस्मों में परागण करने में सहायक होती है। जुलाई के शुरू में 20 किलोग्राम की रेड गोल्डन किस्म के सेब की पेटी के 2,000 रुपये तक दाम बागवानों को मिले, लेकिन इस बार फसल ज्यादा होने और बांग्लादेश को निर्यात बंद होने के कारण माह के अंत तक 600 से 800 रुपये प्रति पेटी दाम पहुंच गए।
रेड गोल्डन के दूसरे सबसे बड़े खरीदार नेपाल के साथ भी कारोबार में अब कमी आई है। इसके कई कारण हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण नेपाल सरकार की ओर से वसूला जाने वाला एडवांस इनकम टैक्स यानी नेपाल कस्टम ड्यूटी है। वर्ष 2019 तक व्यापारियों से गाड़ी के वजन के हिसाब से यह टैक्स मात्र 5 से 7 फीसदी ही वसूला जाता था। वर्ष 2020 में नेपाल सरकार ने इसे 22 फीसदी कर दिया था। हालांकि इस साल 17 जुलाई, 2025 को नेपाल सरकार ने व्यापारियों की मांग पर इसे 7 फीसदी घटाकर 15 फीसदी कर दिया है।
नेपाल में हिमाचल के सेब की मांग कम होने का दूसरा कारण यह कि अब नेपाल के कई क्षेत्रों में सेब की फसल तैयार होने लगी है। नेपाल के महेंद्रनगर के रहने वाले सेब कारोबारी रूपेश अग्रवाल ने बताया कि नेपाल के जुमला छुमला, रोलपा, मनांग मुस्तांग जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों में सेब की पैदावार होने लगी है। सेब की किस्मों को हिमाचल से ले जाकर नेपाल में तैयार किया गया है। यही नहीं, हिमाचल के कई बड़े बागवान भी नेपाल में बगीचे लेकर वहां सेब तैयार कर रहे हैं। अग्रवाल ने बताया कि अब चीन से भी सेब नेपाल पहुंचने लगा है।
हिमाचल व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र ठाकुर ने बताया कि पांच-छह साल पहले जहां सेब सीजन में शिमला से रोजाना नेपाल के लिए 50 से ज्यादा सेब से लदे ट्रक रवाना होते थे, वहीं अब यह मांग कम हुई है। इसके बावजूद अभी भी नेपाल के लिए रोजाना 25 से 30 ट्रक यानी करीब 360 टन सेब जा रहे हैं।
हिमाचल आढ़ती एसोसिएशन के पूर्व प्रधान एवं फल कारोबारी चौधरी नाहर सिंह ने बताया कि हिमाचल के सेब कारोबार पर ईरान का सेब भारी पड़ रहा है। गैरकानूनी तरीके से अफगानिस्तान होकर सड़क मार्ग से बिना शुल्क ईरान का सेब देश में पहुंच रहा है। ईरान का सेब हिमाचल के सेब के मुकाबले न सिर्फ सस्ता है, बल्कि उसकी मिठास भी ज्यादा है। ईरान ने अफगानिस्तान मार्ग इसलिए चुना है, क्योंकि अफगानिस्तान के साथ भारत की ट्रेडिंग फ्री है।
बांग्लादेश से खरीदार अब सेब लेने नहीं आ रहे। भारत के साथ तनाव और ज्यादा ड्यूटी इसका कारण है। रेड गोल्डन की सबसे अधिक खपत बांग्लादेश और नेपाल में ही होती है। मांग कम होने से हमारी मंडियों में रेड गोल्डन के दाम भी गिर गए हैं। हमारे आढ़ती रेड गोल्डन नेपाल भेज रहे हैं। नेपाल के खरीदार सेब खरीदने सीधे हमारी मंडियों में कम आते हैं।– देवानंद वर्मा, चेयरमैन, एपीएमसी शिमला एवं किन्नौर
