
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के कर्मचारियों के हक में एक और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी को 15 मई 2003 की तय कट ऑफ तारीख (जिस दिन राज्य में पुरानी पेंशन बंद हुई थी) से पहले वर्कचार्ज स्टेटस मिल गया था, तो वह नागरिक सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत पुरानी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का हकदार होगा। भले ही उसकी सेवाओं का नियमितीकरण 2003 के बाद हुआ हो
न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने वित्त विभाग की ओर से पेंशन रोकने के 2019 के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया। साथ ही प्रतिवादी राज्य सरकार और वन विभाग को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं को सीसीएस पेंशन नियम, 1972 के तहत पेंशन और अन्य सभी सेवानिवृत्ति लाभों (जैसे ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट) के लिए पात्र मानते हुए आगे की कार्यवाही करें। अदालत ने कहा कि पुरानी पेंशन सीसीएस पेंशन नियम 1972 का लाभ पाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि कर्मचारी को वर्क चार्ज स्टेटस 15 मई 2003 से पहले मिल चुका था।
चूंकि वर्क चार्ज अवधि को भी पेंशन की गणना के लिए नियमित सेवा के साथ जोड़ा जाता है, इसलिए पात्रता का समय अपने आप कट-ऑफ तारीख से पीछे चला जाता है। अदालत ने आगे कहा कि अगर इन कर्मचारियों को वर्क चार्ज का दर्जा 15 मई 2003 के बाद मिला होता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। लेकिन इस मामले में दोनों याचिकाकर्ताओं को यह दर्जा साल 2003 और 2001 में ही मिल चुका था।याचिकाकर्ता और उनके एक अन्य साथी को वर्ष 1993 और 1991 में वन विभाग में दैनिक भोगी (डेली वेजर) के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में विभाग ने उन्हें 1 फरवरी 2003 और 1 अप्रैल 2001 से वर्क चार्ज स्टेटस दे दिया था। 2007 में उनकी सेवाओं को नियमित किया गया।
गुहार लगाई थी कि उन्हें राज्य सरकार के दायरे में लाते हुए सभी पेंशनभोगी लाभ दिए जाएं और विभाग द्वारा जारी उस विवादित आदेश पूरी तरह से निरस्त और खारिज किया जाए। जब उन्होंने पुरानी पेंशन और जीपीएफ नंबर आवंटित करने की मांग की, तो सरकार ने 13 मई 2019 को उनकी अर्जी यह कहकर खारिज कर दी कि उनकी सेवाएं 15 मई 2003 के बाद नियमित हुई हैं, इसलिए वे पुरानी पेंशन के हकदार नहीं हैं। सरकार के इसी आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। वहीं सरकार की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2007 में नियमित होने के बाद ही राज्य सरकार के पूर्ण कर्मचारी बने थे। चूंकि उनका नियमितीकरण कट-ऑफ तारीख मई 2003 के बाद का है, इसलिए उन्हें 1972 के पेंशन नियमों के दायरे में नहीं लाया जा सकता। हालांकि अदालत ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
