शिमला: हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं को लेकर मौसम पूर्वानुमान अब पहले से अधिक सटीक बनाने की दिशा में अहम काम सामने आया है। वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में सामने आया है कि मौसम मॉडल में जमीन की वास्तविक स्थिति से जुड़ा हाई रिजॉल्यूशन डेटा शामिल करने से बारिश के समय, स्थान और तीव्रता का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है।

आईआईटी भुवनेश्वर और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के वैज्ञानिकों की स्टडी के अनुसार, जमीन की नमी, तापमान और भूमि उपयोग-भूमि आवरण की वास्तविक जानकारी को मौसम मॉडल में शामिल करने से भारी बारिश के पूर्वानुमान में सुधार हुआ। हाई रिजॉल्यूशन लैंड डेटा असिमिलेशन सिस्टम (HRLDAS) और इसरो के अपडेटेड भूमि उपयोग-भूमि आवरण डेटा वाले मॉडल में भारी बारिश के पूर्वानुमान की औसत त्रुटि 40 प्रतिशत से अधिक से घटकर करीब 32 प्रतिशत रह गई।

2023 की भारी बारिश को बनाया आधार
यह अध्ययन अगस्त 2023 में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हुई भारी बारिश की घटना पर आधारित है। उस दौरान कई क्षेत्रों में भारी वर्षा के साथ भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, सड़कें बंद होने और अन्य नुकसान की घटनाएं सामने आई थीं। वैज्ञानिकों ने इसी घटना के आधार पर अलग-अलग मौसम मॉडल और भूमि संबंधी डेटा तकनीकों का परीक्षण किया। शोध 19 सितंबर 2026 को Discover Geoscience में प्रकाशित हुआ।

अब ज्यादा बेहतर पता चल सकेगा कि बारिश कहां और कितनी होगी
नई तकनीक का फायदा यह होगा कि किसी क्षेत्र में बारिश कब तेज हो सकती है, उसका फैलाव कितना होगा और उसकी तीव्रता कितनी रह सकती है—इसका बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक होने वाली भारी बारिश और उससे पैदा होने वाले फ्लैश फ्लड के जोखिम को समझने में यह जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है।

फ्लैश फ्लड की चेतावनी में भी मददगार सिस्टम
हिमाचल में फ्लैश फ्लड के जोखिम को लेकर पहले से ही वैज्ञानिक चेतावनी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। IMD से जुड़ी एक 2026 की स्टडी में पाया गया कि South Asia Flash Flood Guidance System ने हिमाचल में 2023 की अत्यधिक बारिश और फ्लैश फ्लड की स्थिति के दौरान खतरे के स्थान और समय को पकड़ने में मदद की और कार्रवाई के लिए उपयोगी समय उपलब्ध कराया।

ऊंचे हिमालयी इलाकों में अभी भी चुनौती
हालांकि पूर्वानुमान की क्षमता में सुधार हुआ है, लेकिन 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं। किन्नौर, लाहौल-स्पीति और ऊंचाई वाले चंबा जैसे क्षेत्रों में जटिल पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियां, सीमित मौसम केंद्र और स्थानीय मौसम प्रक्रियाएं सटीक पूर्वानुमान को मुश्किल बनाती हैं।

हिमाचल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
हिमाचल की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति के कारण अचानक भारी बारिश के बाद फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार ऊपरी सतलुज और ब्यास घाटियों जैसे क्षेत्रों में तेज बारिश और अचानक बढ़े नदी प्रवाह के कारण फ्लैश फ्लड का खतरा रहता है।

यानी आने वाले समय में मौसम की जानकारी सिर्फ यह बताने तक सीमित नहीं रहेगी कि बारिश होगी या नहीं, बल्कि तकनीक के बेहतर इस्तेमाल से यह समझने में मदद मिलेगी कि बारिश कब, कहां और कितनी तीव्र हो सकती है और किन क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।

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