शुक्रास्त और सूतक की मान्यता को लेकर महिलाओं में असमंजस, सरगी से लेकर चंद्रमा को अर्घ्य देने तक जानें व्रत की पूरी विधि

शिमला। हिमाचल प्रदेश में करवा चौथ का पर्व 29 अक्तूबर को श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाएगा। विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखने वाले इस पर्व पर महिलाएं पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और वैवाहिक जीवन की खुशहाली की कामना के साथ व्रत रखती हैं। पर्व को लेकर महिलाओं ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। इस बार करवा चौथ पर शुक्रास्त और सूतक की मान्यता को लेकर भी चर्चा है, जिससे खासकर नवविवाहिताओं और पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

28 अक्तूबर की रात से शुरू होगी चतुर्थी तिथि

शिमला के गंज बाजार स्थित राधा कृष्ण मंदिर के पुजारी भगवती प्रसाद के अनुसार, करवा चौथ की चतुर्थी तिथि 28 अक्तूबर की रात 1:06 बजे शुरू होगी और 29 अक्तूबर की रात 10:09 बजे तक रहेगी। उन्होंने बताया कि पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:38 बजे से 6:56 बजे तक रहेगा।

सरगी से चंद्र दर्शन तक निभाई जाती हैं परंपराएं

करवा चौथ पर महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करती हैं। सरगी में फल, मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं। इसके बाद महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प लेती हैं। कई महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं।

शाम को करवा माता के साथ भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद करवा चौथ की व्रत कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा निभाई जाती है। रात को चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अर्घ्य दिया जाता है और फिर व्रत खोला जाता है।

शुक्रास्त और सूतक को लेकर अलग-अलग मान्यताएं

करवा चौथ से पहले शुक्रास्त को लेकर भी धार्मिक चर्चाएं हो रही हैं। पुजारी भगवती प्रसाद ने बताया कि इस विषय में अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। उनके अनुसार, शुक्रास्त 28 अक्तूबर को समाप्त होने की बात कही जा रही है, जबकि सूतक की मान्यता 29 अक्तूबर तक रहने को लेकर भी चर्चा है।

इस स्थिति में नवविवाहिताओं और पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं के मन में सवाल उठ सकते हैं। ऐसे में व्रत और पूजा से संबंधित निर्णय अपनी पारिवारिक परंपराओं तथा विश्वसनीय पंचांग के अनुसार लेना उचित रहेगा।

स्थानीय पंचांग से करें चंद्रोदय के समय की पुष्टि

करवा चौथ का पर्व हिमाचल प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को पूजा-अर्चना करती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत पूरा करती हैं। चंद्रोदय का समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है, इसलिए महिलाओं को अपने क्षेत्र के पंचांग से चंद्रमा निकलने के समय की पुष्टि करनी चाहिए।

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