उत्तरी भारत में पहली बार अल्ट्रा हाई-परफॉरमेंस फाइबर रीइंफोर्सड कंकरीट (यूएचपीएफआरसी) तकनीक से बने ‘गडर’ किरतपुर-मनाली फोरलेन पर मंडी से पंडोह के बीच बनाए जा रहे तीन पुल में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ‘गडर’ यानी पुल के ऊपरी ढांचे को इसी बरसात से पहले पुल के बने पिलरों पर स्थापित करने का लक्ष्य है। इन तीन पुलों के बनने से फोरलेन पर सफर और सुगम होगा। सामरिक दृष्टि से अहम किरतपुर-मनाली फोरलेन पर अब नई तकनीक से बने गडर को लांच किया जा रहा है। खास है कि इस तकनीक में स्टील की जगह फाइबर का इस्तेमाल होता है और इसका वजन भी पारंपरिक कंकरीट वाले गडर के बजाय कम होता है। ऐसे में आसानी से मशीन के जरिये इसे लांच किया जा सकता है। इसमें समय के साथ कंकरीट की भी बचत होती है।

नई तकनीक से बने ऊपरी ढांचा यानी गडर को पुणे से मंगवाया गया है। इन गडर को पुल के पिलर यानी निचला पूरा हिस्सा बनने के बाद ऊपर से मशीनरी के जरिये स्थापित किया जाएगा। हालांकि पारंपरिक कंकरीट गडर के मुकाबले इसकी कीमत भी कम है, लेकिन पुणे से ट्रांसपोर्ट होने के कारण हिमाचल में कीमत बराबर ही पड़ रही है। करीब एक करोड़ रुपये से तीन पुलों के लिए इस तकनीक से बने कंकरीट गडर हिमाचल पहली बार लाए गए हैं। पुणे में ही इनकी गुणवत्ता समेत अन्य चीजें जांच परखी हैं। मंडी से पंडोह के बीच सांबल, आठ मील व नौ मील में बन रहे पुलों में इन गडर का इस्तेमाल किया जाएगा। उधर, निर्माता कंपनी केएमसी के प्रोजेक्ट मैनेजर सत्या ने बताया कि पुलों का निर्माण कार्य तेजी से जारी है। निमयानुसार नई तकनीक आधारित गडर पुलों पर स्थापित किए जाएंगे।

यूएचपीएफआरसी तकनीक में उन्नत निर्माण सामग्री रहती है जो पारंपरिक कंक्रीट की तुलना में अधिक मजबूत और टिकाऊ होती है। इसमें संपीड़न शक्ति पारंपरिक कंक्रीट की तुलना में बहुत अधिक होती है। उच्च तन्य शक्ति होना इसे अधिक लचीला बनाता है। इसे खारे पानी और अन्य हानिकारक तत्वों के लिए भी अधिक प्रतिरोधी होता है। यूएचपीएफआरसी में कम रखरखाव की आवश्यकता होती है क्योंकि यह अधिक टिकाऊ और कम नुकसान के प्रति संवेदनशील होता है। यह लंबे पुलों के लिए सबसे अधिक उपयुक्त रहता है। इमारतों के अलावा सुरंगें, जलाशय और पानी की पाइपलाइन में भी इसे इस्तेमाल लाया जा सकता है। इस तकनीक में कंकरीट एफ 155 का इस्तेमाल होता है। जबकि पारंपरिक गडर में एम 50 का इस्तेमाल होता है।

यूएचपीएफआरसी तकनीक से बने गडर का इस्तेमाल तीन पुलों में किया जा रहा है। इस तरह की तकनीक से बने गडर पहली बार उत्तरी भारत में इस्तेमाल हो रहे हैं। -वरुण चारी, परियोजना निदेशक, एनएचएआई मंडी इकाई