धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। गगल हवाई अड्डे के आसपास संदिग्ध भूमि सौदों की जांच के दौरान राजस्व रिकॉर्ड से एक अहम शर्त गायब होने का मामला उजागर हुआ है। विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1989 में एक गैर-कृषक व्यक्ति को जमीन खरीदने की अनुमति देते समय स्पष्ट किया गया था कि उसे कृषक का दर्जा नहीं मिलेगा। इस शर्त को राजस्व रिकॉर्ड में लाल स्याही से दर्ज किया जाना था, लेकिन जांच में यह टिप्पणी रिकॉर्ड में नहीं मिली।

8 जमीन सौदों की जांच

जांच रिपोर्ट के अनुसार, कांगड़ा क्षेत्र निवासी विनोद कुमार ने 21 दिसंबर 1989 को मौजा उज्जैन के हलैर कलां में 0.0355 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी। इसके लिए सरकार ने 27 सितंबर 1989 को हिमाचल प्रदेश मुजारियत एवं भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत अनुमति दी थी। इसमें स्पष्ट शर्त थी कि वह गैर-कृषक ही रहेंगे और इस प्रतिबंध को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।

जांच के मुताबिक, बाद में उनकी पत्नी रत्न प्रभा और बेटे मुनीष कुमार के नाम पर भी विभिन्न क्षेत्रों में जमीन खरीदने के मामले सामने आए। एसआईटी की रिपोर्ट में परिवार के तीनों सदस्यों के नाम कुल आठ भूमि सौदों का उल्लेख है। इनमें एक सौदा विनोद कुमार, चार उनकी पत्नी और तीन उनके बेटे के नाम पर दर्ज हैं।

कृषक प्रमाणपत्रों को लेकर उठे सवाल

जांच के अनुसार, विनोद कुमार की पत्नी ने 17 मई 2008 को गाहलियां में जमीन खरीदी। इस सौदे में पति के नाम वर्ष 1989 में खरीदी गई जमीन की जमाबंदी का इस्तेमाल किया गया था।

इसके बाद पत्नी और बेटे ने कथित तौर पर कृषक प्रमाणपत्र हासिल कर कांगड़ा तहसील के विभिन्न क्षेत्रों में जमीन खरीदी। पत्नी के नाम वर्ष 2010, 2024 और 2025 में भी भूमि सौदे दर्ज हैं। वहीं, बेटे के नाम वर्ष 2009, 2020 और 2024 में जमीन खरीदने के तीन सौदे सामने आए हैं।

एसआईटी की रिपोर्ट में पांच सौदों के तहत कुल 0.1647 हेक्टेयर यानी लगभग 3.26 कनाल जमीन का क्षेत्रफल दर्ज किया गया है।

विजिलेंस जांच के घेरे में राजस्व अधिकारी

मामले में राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो के धर्मशाला थाने में 24 अक्तूबर को प्राथमिकी दर्ज की गई। एफआईआर में विनोद कुमार, उनकी पत्नी रत्न प्रभा, बेटे मुनीष कुमार और संबंधित राजस्व अधिकारियों व कर्मचारियों को नामजद किया गया है।

अब जांच एजेंसी यह पता लगाएगी कि वर्ष 1989 में जमीन खरीदने की अनुमति के दौरान लगाई गई शर्त राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज क्यों नहीं हुई और बाद में कृषक प्रमाणपत्र किन दस्तावेजों के आधार पर जारी किए गए।

जांच के दायरे में संबंधित पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार और पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका भी शामिल है। विजिलेंस सरकारी अनुमति, जमाबंदी, इंतकाल, कृषक प्रमाणपत्र और जमीन की रजिस्ट्रियों से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल करेगी।

जांच के बाद सामने आएगी पूरी तस्वीर

इस मामले में जमीन खरीदने की अनुमति की शर्तों, राजस्व रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं और कृषक प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया की जांच की जा रही है। जांच एजेंसी यह भी पता लगाएगी कि संबंधित दस्तावेजों में जरूरी टिप्पणी दर्ज क्यों नहीं मिली।

अब जांच का मुख्य सवाल यही है कि राजस्व रिकॉर्ड से अहम शर्त कैसे गायब हुई और इसके बाद जमीन खरीदने के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। विजिलेंस की जांच पूरी होने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।