हिमाचल प्रदेश में पांच बीघा भूमि नियमितीकरण वाली नीति पर 23 साल बाद मंगलवार को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आएगा। राज्य की नियमितीकरण नीति के तहत सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वालों लोगों से तत्कालीन प्रदेश सरकार ने आवेदन मांगे थे। इसके तहत भूमि को नियमितीकरण करने के लिए एक लाख पैंसठ हजार से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। तत्कालीन भाजपा सरकार ने भू-राजस्व अधिनियम में संशोधन कर धारा 163-ए को जोड़ा। इसके तहत लोगों को पांच से 20 बीघा तक जमीन देने और नियमितीकरण करने का फैसला लिया गया था, जिससे प्रदेश में जरूरतमंद लोगों को जमीन दी जा सके।

न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने 8 जनवरी को सुनवाई के बाद इस फैसले को सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ता पूनम गुप्ता की ओर से नीति की वैधता को लेकर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। अगस्त 2002 में दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने प्रकिया जारी रखने के आदेश दिए थे, जबकि पट्टा देने से मना कर दिया था। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से दलीलें दी गईं कि प्रदेश सरकार ऐसी नीति नहीं बना सकती। वहीं, महाधिवक्ता अनूप रतन ने कहा था कि प्रदेश के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार ऐसी नीति बना सकती है। प्रदेश में प्राकृतिक आपदा के कारण लोग बेघर और भूमिहीन हो गए हैं।