हाटी समुदाय को जनजाति दर्जा को लेकर दायर याचिकाओं पर अब 2 जून को बहस होगी। हाईकोर्ट में इस मामले को लेकर शुक्रवार को सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि निरसन और संशोधन विधेयक 2025 के पारित होने के बाद 2023 का अधिनियम संख्या 14 (संविधान अनुसूचित जनजाति आदेश संशोधन)अब भी प्रभावी है। जबकि पिछली सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया था कि इस नए विधेयक के कारण विचाराधीन याचिकाएं अब निरर्थक हो गई हैं और इनका कोई कानूनी आधार नहीं बचा है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं से स्पष्टीकरण मांगा था कि क्या 2023 के संशोधन अधिनियम के तहत किए गए बदलाव अभी भी प्रभावी हैं या उन्हें निरसन और संशोधन विधेयक, 2025 के तहत समाप्त कर दिया गया है। खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए तथ्यों के सत्यापन के निर्देश दिए थे। वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि यद्यपि 2023 के संशोधन अधिनियम को 2025 के निरसन विधेयक की अनुसूची में शामिल किया गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संविधान में किए गए मूल संशोधन समाप्त हो गए हैं।

हाईकोर्ट ने प्रदेश के निजी बस ऑपरेटरों को फिलहाल बड़ी राहत दी है। ऑपरेटर की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने विवादित योजना के कार्यान्वयन पर वर्तमान यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। अदालत के इस निर्णय के बाद अब हिमाचल पथ परिवहन की ओर से प्रस्तावित नई परमिट स्कीम के तहत नए परमिट जारी नहीं किए जाएंगे जब तक कि मामले पर अगली सुनवाई में कोई अंतिम निर्णय नहीं हो जाता। हाईकोर्ट में यह याचिका डिस्ट्रिक्ट कांगड़ा प्राइवेट बस ऑपरेटर्स वेलफेयर सोसाइटी की ओर से दायर की गई है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने प्रतिवादी केंद्र सरकार,राज्य सरकार और अन्य संबंधित विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी। याचिका में सरकार की प्रस्तावित योजना की कानूनी वैधता को चुनौती दी है।

प्रदेश हाईकोर्ट में वन विकास निगम के कर्मचारियों की संशोधित ग्रेच्युटी के भुगतान को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए हिमाचल प्रदेश राज्य वन विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक डॉ. संजय सूद ने स्पष्ट किया कि निगम के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) ने निर्णय लिया था कि 1 जनवरी 2016 के बाद सेवानिवृत्त होने वाले या सेवा के दौरान जान गंवाने वाले कर्मचारियों को संशोधित ग्रेच्युटी का लाभ दिया जाएगा। हालांकि, इस निर्णय के कार्यान्वयन में तकनीकी बाधाएं सामने आई हैं।

वन निगम के वित्तीय सलाहकार और प्रदेश सरकार के वित्त सचिव ने निर्देश दिया है कि निगम पर ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम लागू होता है।इस नियम के अनुसार, संशोधित ग्रेच्युटी केवल केंद्र सरकार की ओर से जारी अधिसूचना की तिथि यानी 29 मार्च 2018 से ही देय है। इसी दिन ग्रेच्युटी की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये की गई थी। प्रबंध निदेशक ने अदालत को बताया कि इसी पृष्ठभूमि के कारण वर्तमान में संशोधित ग्रेच्युटी केवल उन कर्मचारियों को दी गई है जो 29 मार्च 2018 के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं। वही, 1 जनवरी 2016 से 29 मार्च 2018 के बीच रिटायर होने वाले कर्मचारी इस लाभ से वंचित रह गए हैं। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत अब इस मामले को मैरिट के आधार पर तय करेगी। मामले की अगली सुनवाई 4 मई को होगी।