
चंबा के चुराह विधानसभा क्षेत्र की गुइला पंचायत के कई गांव आज भी सड़क सुविधा का इंतजार कर रहे हैं। भनौड़ी, अलवास, अयूंडा और गुइला गांवों की करीब 3500 आबादी के लिए सड़क आज भी सबसे बड़ी जरूरत बनी हुई है। सबसे मुश्किल हालात उस समय पैदा होते हैं, जब किसी ग्रामीण की मौत हो जाती है। शव को घर तक पहुंचाने के लिए परिजनों और ग्रामीणों को चार से पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पगडंडियों के सहारे तय करनी पड़ती है।
अलवास के आगे फिर शुरू हो जाता है पैदल सफर
ग्रामीणों के अनुसार अलवास तक सड़क पहुंच चुकी है, लेकिन इसके आगे भनौड़ी, अयूंडा और गुइला गांवों तक सड़क सुविधा नहीं है। इन गांवों तक पहुंचने के लिए लोगों को पैदल पगडंडियों और खड़ी चढ़ाई का सहारा लेना पड़ता है।
राशन, खाद्य सामग्री, सीमेंट, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री भी खच्चरों के जरिए घरों तक पहुंचाई जाती है। ग्रामीणों को एक खच्चर के लिए करीब 250 रुपये किराया देना पड़ता है, जिससे रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च और बढ़ जाता है।
शव को घर पहुंचाना बन जाता है सबसे बड़ी चुनौती
सड़क की कमी का सबसे दर्दनाक असर किसी ग्रामीण की मौत के बाद दिखाई देता है। परिजनों और ग्रामीणों को शव को कठिन पहाड़ी रास्तों से होते हुए चार से पांच किलोमीटर तक ले जाना पड़ता है। खड़ी चढ़ाई और पगडंडी वाला रास्ता इस पूरी प्रक्रिया को बेहद मुश्किल बना देता है।
बच्चों की पढ़ाई और इलाज पर भी असर
सड़क नहीं होने का असर केवल सामान ढोने तक सीमित नहीं है। बच्चों को स्कूल पहुंचने और बीमार लोगों को स्वास्थ्य केंद्र तक ले जाने में भी ग्रामीणों को परेशानी होती है। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण कई परिवार गांव छोड़कर दूसरी जगह जाने को मजबूर हो रहे हैं।
1952 में यहां पहुंचे थे डॉ. यशवंत सिंह परमार
भनौड़ी गांव का ऐतिहासिक महत्व भी बताया जाता है। वर्ष 1952 में हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार यहां पहुंचे थे। ग्रामीणों के अनुसार पुराने समय में यह क्षेत्र पांगी, जांस्कर, लद्दाख, लाहौल-स्पीति और तिब्बत की ओर जाने वाले यात्रियों का पड़ाव भी रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले इस क्षेत्र में आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव चिंता का विषय है।
ग्रामीणों ने बताई अपनी परेशानी
ग्रामीण पेमा कलसंग ने कहा कि सड़क के अभाव में यहां जीवन यापन करना मुश्किल है। टीडी कांपा के अनुसार सड़क को विकास की भाग्य रेखा कहा जाता है, लेकिन गांव में सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण करीब 3500 लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है।
संजू कांपा ने बताया कि अलवास से चार से पांच किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पैदल तय करने के बाद ही गांवों तक पहुंचा जा सकता है। वहीं येसी दोरजे ने बताया कि खाद्य सामग्री और निर्माण सामग्री पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को प्रति खच्चर करीब 250 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
वन स्वीकृति और बजट का इंतजार
चुराह विधायक हंसराज ने बताया कि अलवास तक सड़क पहुंच चुकी है और आगे सड़क विस्तार की योजना है। हालांकि इसके लिए अभी बजट का प्रावधान नहीं हो पाया है और वन विभाग की अनापत्ति भी लंबित है।
कांग्रेस नेता यशवंत खन्ना ने इस मामले को मुख्यमंत्री के समक्ष उठाने की बात कही है। लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता जोगेंद्र शर्मा ने बताया कि अलवास से भनौड़ी सड़क का एफसीए मामला स्वीकृति के लिए वन विभाग को भेजा गया है।
अब ग्रामीणों की उम्मीद वन स्वीकृति और बजट की प्रक्रिया पूरी होने पर टिकी है, ताकि वर्षों से चली आ रही सड़क की समस्या दूर हो सके और 3500 की आबादी को पगडंडी के सहारे जीवन जीने की मजबूरी से राहत मिल सके।
