
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े एक मामले में फैसला दिया है कि यदि किसी पंचायत प्रतिनिधि ने चुनाव लड़ने से पहले सरकारी भूमि पर अतिक्रमण किया था और वह स्थिति चुनाव के बाद भी बनी रहती है, तो उसे पद से हटाने या चुनाव रद्द कराने का एकमात्र कानूनी उपाय चुनाव याचिका है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्यतः चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दायर करनी होती है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने कहा कि हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 122(2)(बी) के तहत उपायुक्त केवल उन मामलों में कार्रवाई कर सकते हैं, जिनमें अयोग्यता चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद पैदा हुई हो।
यदि कथित अतिक्रमण चुनाव से पहले का है, तो विवाद का निपटारा केवल पंचायती राज अधिनियम के तहत नामित अधिकृत अधिकारी की ओर से चुनाव याचिका के माध्यम से किया जाएगा। अदालत ने याचिकाकर्ता नेत्र सिंह की याचिका का निपटारा करते हुए उन्हें धारा 163 के तहत चुनाव याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी। प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि 65 बीघा सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण की शिकायतों पर हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई की जाए।
मामला सिरमौर जिले की राजगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत जडोल तपरोली से जुड़ा है। आरोप है कि नवनिर्वाचित प्रधान और उनके पति ने करीब 65 बीघा सरकारी भूमि पर सेब का बगीचा लगाकर कब्जा किया हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना था कि पंचायती राज अधिनियम के अनुसार सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाला व्यक्ति या उसका परिवार पंचायत चुनाव लड़ने और पद पर बने रहने के लिए अयोग्य होता है। इस संबंध में उपायुक्त सिरमौर को शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
उधर, प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि वेतन संशोधन या किसी नीति से जुड़ा कोई भी आदेश, जिससे कर्मचारियों के वित्तीय हितों पर असर पड़ता है, उसे केवल विभागीय वेबसाइट पर डाल देना ही काफी नहीं है। विभाग या संस्था की यह जिम्मेदारी है कि वह इस प्रकार की सूचना को कर्मचारियों तक उचित और स्वीकृत माध्यम से पहुंचाए। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने माना कि वित्तीय असर डालने वाले आदेशों के लिए केवल इतना कह देना कि आदेश वेबसाइट पर था, काफी नहीं है। कर्मचारी को इसकी जानकारी देना विभाग की जिम्मेदारी है। अदालत ने हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड की अपील को खारिज करते हुए एकल जज के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत के इस फैसले के बाद अब पदोन्नत हुए कर्मचारी नरेंद्र कुमार को 15 फीसदी वेतन वृद्धि का विकल्प चुनने की अनुमति मिलेगी और जूनियर कर्मचारियों के मुकाबले उनके वेतन में जो विसंगति आई थी, उसे दूर किया जाएगा।
याचिकाकर्ता नरेंद्र एचपीएसईबीएल में बतौर वरिष्ठ सहायक कार्यरत हैं। एक मई 2017 को पदोन्नत हुए थे। बिजली बोर्ड द्वारा जारी 13 अप्रैल 2022 के आदेश (जिसमें 1 जनवरी 2016 से 12 अप्रैल 2022 के बीच पदोन्नत कर्मचारियों को 15 फीसदी वेतन वृद्धि का विकल्प चुनने की सुविधा थी) की जानकारी फील्ड में तैनात होने के कारण उन्हें समय पर नहीं मिल सकी। जनवरी 2023 में जब उनका स्थानांतरण मुख्यालय में हुआ, तब उन्हें पता चला कि उनसे जूनियर कर्मचारी उनसे अधिक वेतन ले रहे हैं। जब उन्होंने 15 फीसदी वेतन वृद्धि के विकल्प की मांग करते हुए अभ्यावेदन दिया, तो बोर्ड ने यह कहकर खारिज कर दिया कि विकल्प चुनने की अंतिम तिथि 12 अक्तूबर 2022 समाप्त हो चुकी है। इस आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एकल जज ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया, जिसके खिलाफ बोर्ड ने डबल बेंच के समक्ष अपील दायर की
प्रदेश हाईकोर्ट ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) के कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई बंद कर दी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की ओर से पारित हालिया आदेश का हवाला देते हुए लिया है। उल्लेखनीय है कि प्रदेश सरकार की ओर से रेरा कार्यालय को धर्मशाला स्थानांतरित करने के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई थी। इस पर हाईकोर्ट ने पहले अंतरिम रोक लगाई थी। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को अपनी पसंद की जगह पर अस्थायी रूप से दफ्तर ले जाने की अनुमति दी थी। 22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता के बयानों और अन्य पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मुख्य निर्देश देकर मामला निस्तारित कर दिया था। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया कि अधिकांश स्थानांतरण कार्य पूरा हो चुका है और धर्मशाला कार्यालय जल्द ही पूर्ण रूप से कार्यशील हो जाएगा। शिमला और आसपास के क्षेत्रों के होम-बायर्स (घर खरीदारों), डेवलपर्स और वकीलों को धर्मशाला जाने-आने में होने वाली असुविधा को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल की व्यवस्था की जाए। मामलों की सुनवाई के लिए वर्चुअल (ऑनलाइन) सुनवाई की सुविधा उपलब्ध कराई जाए। यदि किसी हितधारक को कोई व्यावहारिक समस्या या कठिनाई आती है, तो वे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं। राज्य सरकार को ऐसे वास्तविक मुद्दों का तुरंत समाधान करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस रुख और निर्देश के बाद कि अब हाईकोर्ट में इस कार्यवाही को जारी रखने का कोई कारण नहीं है।
