कभी ढोल-नगाड़ों की थाप, फूलों की बारिश और भेड़ों के साथ पैदल कदमों की आहट से मणिमहेश जाने वाले रास्ते गूंज उठते थे। अब वही मणिमहेश यात्रा चुपचाप बसों और गाड़ियों में सिमटकर गुजर जाती है, बिना किसी को खबर हुए।

आधुनिकता के दौर में मणिमहेश यात्रा की पारंपरिक रौनक कम होती जा रही है। कभी जम्मू-कश्मीर से सैकड़ों श्रद्धालु पैदल पधरी होते हुए चंबा पहुंचते थे। उनके साथ जम्मू पुलिस होती थी, जो चंबा की सीमा तक उन्हें सुरक्षा देती थी। अब यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है। श्रद्धालु बसों या निजी गाड़ियों से सीधे चंबा पहुंच रहे हैं।

पहले यात्रा के हर पड़ाव पर श्रद्धालुओं का एक दिन का ठहराव होता था। ढोल-नगाड़ों की थाप पर त्रिशूल हाथ में लिए जत्थे जब कहीं से गुजरते थे तो स्थानीय लोग उन पर फूल बरसाकर स्वागत करते थे। अब हालात ऐसे हैं कि लोगों को पता ही नहीं चलता कि जम्मू से श्रद्धालुओं का जत्था कब उनके इलाके से निकल गया।

अतीत में न तो लंगर लगते थे और न ही रास्ते में खाने-पीने की कोई व्यवस्था होती थी। ऐसे में श्रद्धालु अपने साथ भेड़ें लेकर चलते थे। रात्रि विश्राम स्थल पर उनकी बलि देकर मांस का भोजन बनाते थे। बलि प्रथा समाप्त होने के बाद यात्री भेड़ों को नहीं लाते। इससे यात्रा की पारंपरिक झलक और भी धुंधली हो गई है।