
हिमाचल प्रदेश में पशुपालकों के लिए जरूरी पशु चारा तूड़ी लगातार महंगी होती जा रही है। बीते दो महीनों में तूड़ी के दामों में करीब 300 रुपये प्रति क्विंटल का उछाल दर्ज किया गया है। दो महीने पहले तूड़ी 600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रही थी, वहीं अब इसके दाम 900 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुके हैं। ऊपर से परिवहन भाड़ा और मजदूरी का खर्च अलग से देना पड़ रहा है, जिससे पशुपालकों की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गई हैं। हिमाचल में गेहूं की कटाई आमतौर पर अप्रैल–मई माह में होती है, इस दौरान तूड़ी उपलब्ध होती है। अभी कटाई का समय दूर है, ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में तूड़ी के दामों में और बढ़ोतरी हो सकती है।
तूड़ी के महंगे होने का सबसे बड़ा कारण गेहूं कटाई के दौरान मजदूरी दरों में तेज बढ़ोतरी बताया जा रहा है। किसानों के अनुसार हाथ से कटाई कराने पर मजदूर मनमाने रेट मांगते हैं। मजबूरी में किसान कंबाइन मशीन से कटाई करवा रहे हैं, जिसमें केवल गेहूं की बालियां कटती हैं और तूड़ी तैयार नहीं हो पाती। खेतों में बचा निचला हिस्सा कई बार जलाना पड़ता है, जिससे तूड़ी का उत्पादन काफी घट गया है।
हिमाचल में तूड़ी की पैदावार सीमित होने के कारण किसानों और पशुपालकों को पंजाब पर निर्भर रहना पड़ता है। साल के अंतिम महीनों तक अधिकांश पशुपालकों के घरों में तूड़ी खत्म हो जाती है और उन्हें बाजार से महंगे दामों पर तूड़ी खरीदनी पड़ती है। पंजाब से टेंपो, ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रकों में तूड़ी लाकर घर-घर बेची जाती है। पंजाब के तूड़ी विक्रेताओं के अनुसार कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर और चंबा जिलों में रोजाना सैकड़ों ट्रक और टेंपो से करीब 25 से 30 हजार क्विंटल तूड़ी हिमाचल भेजी जा रही है। मांग ज्यादा होने से कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। तूड़ी के बढ़ते दामों से खासकर दूध उत्पादन पर निर्भर पशुपालकों की चिंता बढ़ गई है।
पशुपालन विभाग चुरूडू के अधिकारी गोपाल कृष्ण ने बताया कि तूड़ी की बढ़ती कीमतों को लेकर प्रशासन गंभीर है। पशुपालकों को वैकल्पिक चारे में हरा चारा, साइलेज और पशु आहार योजनाओं के प्रति जागरूक किया जा रहा है। यदि तूड़ी की कीमतें असामान्य रूप से बढ़ती हैं और क्षेत्र सूखा ग्रस्त घोषित होता है, तो मामला उच्च स्तर पर उठाया जाएगा ताकि पशुपालकों को राहत मिल सके।
पंजाब से तूड़ी मंगवाने में भाड़ा और मजदूरी काफी बढ़ गई है। पहले जो तूड़ी 600–650 रुपये प्रति क्विंटल मिल जाती थी, अब वही 900 रुपये तक पड़ रही है। मजबूरी में महंगे दामों पर तूड़ी बेचनी पड़ रही है। –मनु जट्ट, भैरा से तुड़ी विक्रेता एवं स्थानीय स्टाल संचालक
इस साल तूड़ी की उपलब्धता कम है। खेतों में पराली और बचा हुआ हिस्सा जलाने से तूड़ी बन ही नहीं पा रही। मांग ज्यादा और सप्लाई कम होने के कारण दाम बढ़ रहे हैं। –काला सिंह, तुड़ी विक्रेता मोगा
पूरा परिवार दूध के कारोबार पर निर्भर है। तूड़ी महंगी होने से खर्च बहुत बढ़ गया है और यदि हालात ऐसे ही रहे तो पशुपालन करना मुश्किल हो जाएगा। –लाल सिंह, पशुपालक दिलबां
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पहले अपनी फसल से ही साल भर की तूड़ी हो जाती थी लेकिन अब कंबाइन से कटाई करनी पड़ती है। इससे तूड़ी कम बनती है और बाजार से 900 रुपये महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती है। ऊपर से मालभाड़ा और मजदूरी अलग से चुकता करनी पड़ रही है। –रमेश चंद राणा, किसान टकारला
