
हिमाचल: अब सूरज की रोशनी से शुद्ध होगा झरनों का पानी, IIT मंडी विकसित कर रहा नई तकनीक
मंडी, 26 अक्टूबर। हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी एक नई तकनीक विकसित करने पर काम कर रहा है। इस शोध के तहत सूरज की रोशनी और फोटो-इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया की मदद से प्राकृतिक झरनों के पानी को शुद्ध करने वाली प्रणाली तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोगों को कम लागत में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध करवाना है।
क्या है इस नई तकनीक की खासियत?
इस तकनीक में प्रकाश-संवेदी सामग्रियों और विद्युत-रासायनिक प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करके पानी में मौजूद हानिकारक प्रदूषकों को हटाने का प्रयास किया जाएगा। शोधकर्ताओं का लक्ष्य ऐसी प्रणाली विकसित करना है, जो पानी में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों और कार्बनिक प्रदूषकों को कम करने में मदद कर सके।
इस तकनीक में सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा, जिससे उन पहाड़ी क्षेत्रों में भी पानी को शुद्ध करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, जहां बिजली और आधुनिक जल शोधन सुविधाएं सीमित हैं।
मंडी के तीन प्राकृतिक जलस्रोतों से लिए नमूने
शोध के शुरुआती चरण में मंडी के कटौला, घोड़ा फार्म और स्कूल बाजार स्थित तीन प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी के नमूने एकत्र किए गए हैं। इन नमूनों की गुणवत्ता और उनमें मौजूद सूक्ष्मजीवों की जांच की गई है। इसके आधार पर शुद्धिकरण प्रणाली विकसित करने का काम आगे बढ़ाया जा रहा है।
प्रस्तावित प्रणाली का पहले प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद IIT मंडी परिसर के आसपास स्थित प्राकृतिक झरनों पर इसकी प्रभावशीलता का आकलन किया जाएगा।
दूरदराज के गांवों को कैसे मिलेगा फायदा?
हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक झरने लंबे समय से पेयजल के प्रमुख स्रोत रहे हैं। हालांकि, प्राकृतिक दिखने वाला पानी भी हमेशा पीने के लिए सुरक्षित नहीं होता। इसमें हानिकारक बैक्टीरिया और कुछ प्रदूषक मौजूद हो सकते हैं।
ऐसे में यदि यह तकनीक सफल रहती है, तो दूरदराज के गांवों में छोटे स्तर पर पानी शुद्ध करने की व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। इससे उन क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है, जहां पारंपरिक जल शोधन संयंत्र स्थापित करना मुश्किल या महंगा है। परियोजना में निरंतर प्रवाह वाली प्रणाली विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
तीन साल की परियोजना पर चल रहा शोध
इस परियोजना का नेतृत्व IIT मंडी के प्रोफेसर डॉ. प्रेम फेलिक्स सिरिल कर रहे हैं। इसे नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज के तहत वित्तीय सहायता मिली है। परियोजना की निर्धारित अवधि तीन वर्ष है।
डॉ. प्रेम फेलिक्स सिरिल के अनुसार, शोध कार्य जारी है और इसके सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद है। हालांकि, तकनीक की वास्तविक प्रभावशीलता, लागत और बड़े स्तर पर इसके इस्तेमाल की संभावनाओं का आकलन शोध के परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
फिलहाल शोध के चरण में है तकनीक
IIT मंडी की यह पहल हिमालयी क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। हालांकि, अभी इस तकनीक पर शोध और परीक्षण होना बाकी है। इसकी सफलता के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह दूरदराज के गांवों में कितनी प्रभावी और किफायती साबित होगी।
